क्या इस्लाम लोगों को मुसलमान बनने के लिए मजबूर करता है?
ईश्वर (अल्लाह) क़ुरआन में कहता है:
धर्म के मामले में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। निःसंदेह सन्मार्ग, पथभ्रष्टता से स्पष्ट हो चुका है। अतः जो कोई ताग़ूत (अल्लाह के सिवा अन्य पूज्यों) का इनकार करे और अल्लाह पर ईमान लाए, तो निश्चय उसने मज़बूत कड़े को थाम लिया, जिसे किसी भी तरह टूटना नहीं। ...
कुरान - 2:256(अर्थ की व्याख्या)
वैसे तो मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि वे इस्लाम के खूबसूरत संदेश को दूसरों तक पहुंचाएँ और साझा करें, लेकिन किसी को भी इस्लाम स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस्लाम को स्वीकार करने के लिए, एक व्यक्ति को ईमानदारी से और स्वेच्छा से ईश्वर (अल्लाह) पर विश्वास करना और उसकी फ़रमाबरदारी (आज्ञा का पालन) करना चाहिए, इसलिए, परिभाषा के अनुसार, किसी को भी इस्लाम स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता (या नहीं किया जाना चाहिए)।
निम्नलिखित पर विचार करें:
- इंडोनेशिया में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी है, फिर भी वहां इस्लाम लाने के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी गई।
- लगभग 14 मिलियन अरब कॉप्टिक ईसाई हैं जो पीढ़ियों से अरब (के दिल) में रह रहे हैं।
- इस्लाम आज पश्चिमी दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ते धर्मों में से एक है।
- हालांकि उत्पीड़न से लड़ना और न्याय को बढ़ावा देना जिहाद छेड़ने के वैध कारण हैं, लेकिन लोगों को इस्लाम स्वीकार करने के लिए मजबूर करना उनमें से एक नहीं है।
- मुसलमानों ने लगभग 800 वर्षों तक स्पेन पर शासन किया, फिर भी उन्होंने कभी लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया।
स्रोत:
islamicpamphlets.com